Feb 13, 2026

इंजीनियरिंग कोर्स फीस को अब भी नियामकीय मंजूरी का इंतजार

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उत्तराखंड के निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में मेडिकल, इंजीनियरिंग समेत विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस तीन साल में रिवाइज किए जाने का स्पष्ट नियम होने के बावजूद अब तक संशोधित नहीं हो पाई है। प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति का गठन इसी उद्देश्य से किया गया था कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संस्थानों द्वारा वसूली जा रही फीस तय मानकों के अनुरूप है या नहीं, लेकिन समिति की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। नियमानुसार समिति को हर तीन वर्ष में फीस की समीक्षा कर उसे संशोधित करना होता है। हैरानी की बात यह है कि अब तक समिति के 12 अध्यक्ष बदले जा चुके हैं, बावजूद इसके फीस संरचना तय नहीं हो सकी। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि समिति का कोरम कभी पूरा नहीं हुआ, जिसके चलते बैठकों में आवश्यक निर्णय नहीं लिए जा सके।

प्रदेश के निजी मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य व्यावसायिक संस्थानों में फीस को लेकर लंबे समय से विवाद की स्थिति बनी रहती है। छात्र-छात्राओं का आरोप है कि उनसे मनमाने तरीके से अधिक शुल्क वसूला जाता है, जबकि संस्थान दावा करते हैं कि उनकी फीस निर्धारित मानकों से कम है। कई छात्रों की यह भी शिकायत है कि भारी-भरकम फीस लेने के बावजूद संस्थानों में अपेक्षित शैक्षणिक सुविधाएं और बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं है। सरकार की ओर से गठित प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित सेवानिवृत्त न्यायाधीश अध्यक्ष होते हैं। इसके अलावा सचिव चिकित्सा शिक्षा, सचिव तकनीकी शिक्षा और सचिव न्याय सदस्य के रूप में शामिल रहते हैं। राज्य सरकार द्वारा नामित सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी, राज्यपाल द्वारा नामित पूर्व कुलपति तथा दो प्रतिष्ठित शिक्षाविद भी समिति का हिस्सा होते हैं। समिति अध्यक्ष द्वारा एक चार्टर्ड अकाउंटेंट को भी नामित किया जाता है। फीस रिवाइज न होने से एक ओर जहां छात्रों और अभिभावकों में असमंजस की स्थिति है, वहीं दूसरी ओर संस्थानों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में जरूरत है कि समिति का कोरम पूरा कर पारदर्शी तरीके से फीस निर्धारण की प्रक्रिया जल्द पूरी की जाए, ताकि छात्रों को राहत मिल सके और विवाद की स्थिति समाप्त हो।