Apr 16, 2026

उत्तराखंड बजट 2026 में स्थानीय स्तर पर उगाए गए मखाना उत्पादों के अनुसंधान और ब्रांडिंग हेतु विशेष फंड

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उत्तराखंड की कृषि अर्थव्यवस्था में एक नया अध्याय जुड़ गया है। अब तक केवल बिहार और सीमित राज्यों तक सिमटी मखाने की खेती अब देवभूमि के जलभराव वाले क्षेत्रों की तकदीर बदलेगी। कृषि मंत्री गणेश जोशी ने हरिद्वार जिले के लक्सर स्थित गंगदासपुर बालावाली गांव में मखाना खेती के पायलट प्रोजेक्ट का औपचारिक शुभारंभ किया। इस दौरान उन्होंने स्वयं खेत में उतरकर मखाना रोपण किया और इसे किसानों की आय में क्रांतिकारी वृद्धि करने वाला कदम बताया।

यह परियोजना बिहार की एक विशेषज्ञ संस्था के सहयोग से शुरू की गई है। कृषि मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुरूप साल 2025 में 'राष्ट्रीय मखाना बोर्ड' का गठन किया गया है। यह बोर्ड उत्तराखंड सहित देश के 11 राज्यों में मखाना उद्योग को आधुनिक और सशक्त बनाने का काम कर रहा है। केंद्र सरकार ने मखाना विकास के लिए साल 2025-26 से 2030-31 तक के लिए 476 करोड़ रुपये का विशाल बजट स्वीकृत किया है। मंत्री जोशी ने जानकारी दी कि योजना के तहत उत्तराखंड को साल 2025-26 के अंतिम त्रैमास के लिए 50 लाख रुपये की प्रारंभिक धनराशि मिल चुकी है। वर्तमान में तीन प्रमुख केंद्रों कृषि विज्ञान केंद्र धनौरी (हरिद्वार), ढकरानी (देहरादून) और काशीपुर (ऊधम सिंह नगर) में किसानों को मखाना उत्पादन का तकनीकी प्रशिक्षण, सेमिनार और वर्कशॉप के माध्यम से दिया जा रहा है। राज्य सरकार ने आगामी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 143.16 लाख रुपये की विस्तृत कार्ययोजना को मंजूरी भी दे दी है। सरकार का लक्ष्य केवल मखाना उगाना नहीं, बल्कि उसके प्रसंस्करण और निर्यात पर भी है। नई नीति के तहत अनुसंधान, उन्नत बीजों का उत्पादन, किसानों का कौशल विकास, वैल्यू एडिशन और मखाने की ब्रांडिंग पर जोर दिया जाएगा। कृषि मंत्री ने कहा कि जिस तरह राज्य में सेब की अति सघन बागवानी, मिलेट्स (मोटे अनाज), कीवी और ड्रैगन फ्रूट के लिए अलग नीतियां लाई गई हैं, उसी तरह मखाना भी उत्तराखंड की नई पहचान बनेगा।शुभारंभ के अवसर पर उद्यान निदेशक महेंद्र पाल, मुख्य उद्यान अधिकारी तेजपाल सिंह और प्रोजेक्ट के अध्यक्ष राजीव रंजन सहित कई कृषि विशेषज्ञ मौजूद रहे। स्थानीय किसानों में इस नई फसल को लेकर भारी उत्साह देखा गया, क्योंकि मखाना उन खेतों के लिए वरदान साबित हो सकता है जहाँ पानी के जमाव के कारण पारंपरिक फसलें नहीं हो पाती थीं।