देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड के रजत जयंती वर्ष और राज्य स्थापना दिवस के पावन अवसर पर प्रदेश के उन तमाम रणबांकुरों के लिए एक बड़ी और सुखद खबर सामने आ रही है, जिन्होंने अपने खून-पसीने और अथक संघर्ष से इस अलग राज्य की नींव रखी थी। राज्य आंदोलनकारियों के लम्बे समय से लंबित और उलझे हुए मुद्दों के समाधान की दिशा में धामी सरकार एक बार फिर ठोस कदम उठाने जा रही है। स्थापना दिवस के इस ऐतिहासिक अवसर पर सरकार आंदोलनकारियों को कई बड़ी सौगातें दे सकती है, जिससे न केवल उनकी नियुक्तियों में आ रही कानूनी अड़चनें दूर होंगी, बल्कि दोहरी पेंशन और चिह्नीकरण की प्रक्रिया भी सरल होने की पूरी उम्मीद है।
उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर राज्य आंदोलनकारियों को धामी सरकार की ओर से बड़ी राहत मिल सकती है। लंबे समय से लंबित नियुक्तियों, दोहरी पेंशन और आंदोलनकारियों के चिह्नीकरण जैसे मुद्दों पर सरकार समाधान की दिशा में कदम उठाने की तैयारी कर रही है। इन मामलों में आ रही कानूनी और प्रशासनिक अड़चनों को दूर करने के लिए सरकार के स्तर पर मंथन चल रहा है। खासतौर पर सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण के तहत नियुक्तियों का रास्ता साफ करने के लिए दो मंत्रियों की उपसमिति गठित करने की तैयारी है। राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी सेवाओं में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का लाभ देते हुए पूर्व में विभिन्न विभागों में नियुक्तियां दी गई थीं। लेकिन वर्ष 2013-14 से जुड़े एक मामले में न्यायालय के स्थगन आदेश के बाद नियुक्तियों की प्रक्रिया प्रभावित हो गई। इसके चलते आरक्षण का लाभ पाने वाले कई आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों से जुड़े मामलों का समाधान नहीं हो पाया। अब सरकार इस कानूनी पेच को समझने और आगे का रास्ता निकालने के लिए दो मंत्रियों की उपसमिति गठित करने पर विचार कर रही है। उम्मीद है कि समिति कानूनी पहलुओं का अध्ययन कर सरकार को समाधान का रास्ता सुझाएगी। आंदोलनकारियों से जुड़ा दूसरा बड़ा मुद्दा दोहरी पेंशन का है। राज्य आंदोलन में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बावजूद अन्य पेंशन का लाभ लेने वाली महिलाओं और पूर्व सैनिकों को राज्य आंदोलनकारी पेंशन नहीं मिल पा रही है। सरकार इस प्रतिबंध को हटाने या इसमें राहत देने के विकल्पों पर विचार कर सकती है। यदि इस संबंध में फैसला होता है तो ऐसे आंदोलनकारियों को लाभ मिल सकेगा, जो दूसरी पेंशन के साथ राज्य आंदोलनकारी पेंशन पाने की पात्रता रखते हैं। राज्य आंदोलनकारियों का चिह्नीकरण भी लंबे समय से विवाद और मांग का विषय रहा है। कई लोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के बावजूद निर्धारित दस्तावेजों और प्रमाणों के अभाव में अब तक चिह्नित नहीं हो पाए हैं। इस समस्या के समाधान के लिए चिह्नीकरण के मानकों में छूट देने पर विचार किया जा रहा है। प्रस्ताव के अनुसार, आंदोलन के दौरान समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों और उपलब्ध दस्तावेजों को भी चिह्नीकरण का आधार बनाया जा सकता है। यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो समाचार पत्रों में आंदोलनकारी के रूप में नाम प्रकाशित होने वाले लोगों के लिए चिह्नीकरण का रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित 10 सदस्यीय समिति की संस्तुति को भी महत्वपूर्ण आधार बनाया जा सकता है। राज्य आंदोलनकारियों के शेष मामलों के समाधान को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात की गई है। राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद के उपाध्यक्ष सुभाष बड़थ्वाल के अनुसार, मुख्यमंत्री ने सभी मुद्दों पर सकारात्मक आश्वासन दिया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि राज्य स्थापना दिवस पर सरकार आंदोलनकारियों को कुछ महत्वपूर्ण सौगात दे सकती है। राज्य निर्माण के लिए संघर्ष करने वाले आंदोलनकारियों की मांगें लंबे समय से लंबित हैं। ऐसे में स्थापना दिवस पर सरकार की ओर से होने वाली घोषणा पर आंदोलनकारी संगठनों की नजरें टिकी हैं। अब देखना होगा कि सरकार इन प्रस्तावों को किस रूप में मंजूरी देती है और वर्षों से समाधान की प्रतीक्षा कर रहे आंदोलनकारियों को कितनी राहत मिल पाती है।

